भारतीय इतिहास में 10 अगस्त के महत्वपूर्ण घटनाएं

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भारत में हिंदी साहित्य के दुनिया में ऐसे ऐसे महापुरषों का जन्म हुआ है जिन्होंने अपनी लेखनी के दम पर क्रान्ति तक ला के रख दी है । जिनके कलम की नोक में तलवार से भी ज्यादा चमक और धार थी ,जो किसी चट्टान को भी काट के गिरा सकती है । उन्होंने अपने अंतिम समय तक हिंदी साहित्य को एक उचाई तक पहुंचाते रहने की कोशिश की और फिर दुनिया को अलविदा कह दिया । आज एक ऐसे ही महापुरुष की पुण्य तिथि है जिन्होंने अपने पुरे जीवन को साहित्य की दुनिया में झोक दिया था। जिनकी कहानिया आज भी समाज के हर पहलू को छूता हुआ नजर आता है । जी हाँ हम बात कर रहें है मशहूर लेखक हरिशंकर परसाई की ।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में जन्मे हरिशंकर परसाई भारत के सबसे ब्यंग लेखकों में से एक जाने जाते हैं । उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में न सिर्फ गुदगुदी पैदा करतीं है बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। परसाई हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। अपने पुरे जीवनकाल में हरिशंकर परसाई ने कुल 31 कहानिया लिखी जिसमे मुंडन,बदचलन,बरात की वापसी ,सुदामा का चावल ,कंधे श्रवण कुमार के आदि शामिल हैं । इसके अलावे उन्होंने 16 लेख लिखी जिसमे माटी कहे कुम्हार से ,प्रेमचंद के फटे जुते, ठिठुरता गणतंत्र ,बेईमानी की परत आदि मशहूर लेख शामिल है । कहानी और लेख के अलावे उन्होंने ३ शार्ट स्टोरीज ,एक बाल साहित्य , 3 नोवेल्स ,3 मेमोआयर्स तथा 7 उपाख्यान यानी अनकडॉट्स लिखे हैं। साहित्य के क्षेत्र में हरिशंकर परसाई के योगदान को भारत हमेशा याद करेगा । फिलहाल आज के टुडेज स्पेशल में इतना ही कल फिर मिलेंगे कल के इतिहास को दोहराने के लिए तब तक देखते रही टीडी न्यूज़ ।