भारतीय इतिहास के पन्नो में आज का दिन ,११ अगस्त स्पेशल

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खुदीराम बोस इस नाम से कौन परिचित नहीं होगा । यह वही नाम है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी थी । इस नाम ने अपनी जिंदगी को भारत के आजादी के लिए ख़ुशी ख़ुशी कुर्बान कर दिया ।
नमस्कार मैं हूँ…
खुदीराम बोस का जन्म कलकत्ता के मेदनीपुर में 3 दिसंबर 1889 ईश्वी में हुई थी । उनके पिता एक अच्छे खासे परिवार से सम्बन्ध रखते थे जिसके कारण बोस को कभी आर्थिक आधार पर कोई कमी नहीं हुई । पर अंग्रेजो के अत्यचआरों ने बचपन में ही उनके मानसपटल पर एक छाप छोर दी थी ,उनपे आजादी दिलाने का भूत इस कदर सवार हुआ की उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। 1905 में लॉर्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। अन्य मामलों में भी उसने क्रान्तिकारियों को बहुत कष्ट दिया था। इसके परिणामस्वरूप किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेजा। उस समय खुदी राम बोस मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रान्तिकारियों की गुप्त संस्था से जुड़ चुके थे ।

किंग्जफोर्ड के दमन से तंग आ कर युगांतर संस्था ने उसे मारने की साजिश की । इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया। 30 अप्रैल 1908 को उन्होंने किंग्जफोर्ड समझ की बग्गी समझ कर बम फेंक दिया परन्तु उसमे दो यूरोपीय महिला की जान चली गई और किंग्जफोर्ड थोड़ी देर से बाहर निकलने के कारण बच गया जिसके बाद वे दोनों वह से भाग खड़े हुए लेकिन अंत में अंग्रेजों ने उन्हें वैनी रेलवे स्टेशन से पकड़ लिया जहाँ प्रफ्फुल कुमार ने खुद को गोली मार ली जबकि खुदी राम बोस पकडे गएँ और उन्हें 11 अगस्त 1908 को फांसी की सजा दे दी गई । छात्र जीवन से ही ऐसी लगन मन में लिये इस नौजवान ने हिन्दुस्तान पर अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के संकल्प में अलौकिक धैर्य का परिचय देते हुए पहला बम फेंका और मात्र 19 वें वर्ष में हाथ में भगवद गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़कर इतिहास रच दिया। बहरहाल आज के टुडेज स्पेशल में इतना ही देखते रहें टीडी न्यूज़ ।