कोरोना महामारी और भारत की अस्मिता :: डॉ गौतम

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आज पूरा देश कोरोना वायरस के सामने जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा है। इतने निस्सहाय-निरुपाय हम पहले कभी नहीं थे। साल भर पहले जब इस महामारी ने हमारे देश में दस्तक दी थी, तब हमारे पास कोई तैयारी नहीं थी। इस एक वर्ष में हमने लंबी यात्रा तय की है। देश तरह-तरह के प्रयोगों के दौर से गुजरा है। हमने एक के बाद एक लॉकडाउन देखे हैं, अपने बीमार पिताजी को 1,200 किलोमीटर साइकिल चलाकर बिहार ले जाने वाली किशोरी देखी है। अपने देस-गांव पैदल लौटते लाखों मजदूरों को देखा है, फिर भी हम इतने असहाय नहीं थे। हालांकि, इस बीच हमारे पास हर तरह के किट हैं, वेंटिलेटर हैं, हमारे पास वैक्सीन भी हैं, हमने वैक्सीन अपने पड़ोसियों को भी भेंट में दी है। हम वैक्सीन डिप्लोमेसी में भी अव्वल रहे। 15 करोड़ अपने लोगों को वैक्सीन लग भी चुकी है, फिर भी हम निरुपाय हैं, क्योंकि महामारी की मार इतनी तेज है कि हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं।
शायद हम अपनी शुरुआती कामयाबी से कुछ ज्यादा ही फूल के कुप्पा हो गए थे। कोविड के संकट को भूलकर हमारे राजनेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने में जुट गए। कोविड प्रोटोकॉल सिर्फ कुछ ही जिम्मेदार लोगों के अनुपालन की चीज रह गया। नेतागण धड़ल्ले से चुनावों में कूद गए। चुनावी रैलियों में कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ने लगीं। यहां तक कि कुंभ जैसे, विशाल जनसमुद्र को आमंत्रित करने वाले आयोजन भी बिना खास तैयारी के होने लगे। सरकारों को ही क्यों दोष दें? जनता स्वयं जैसे चादर ताने सो रही थी। वैक्सीन है, लेकिन हम उसे लगवाने में कोताही बरतने लगे थे। शादी-ब्याह, उत्सव-त्यौहार उसी पुराने अंदाज में मनाने लगे थे, इसलिए जब कोरोना के बहुरूपी वायरस ने हमें सुषुप्तावस्था में पाया, तो चौतरफा प्रहार कर दिया। एक साथ बड़ी संख्या में पीड़ित लोग अस्पतालों की तरफ कातर निगाह से देखने लगे। व्यवस्था चरमराने लगी। नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। न हमारे पास पर्याप्त ऑक्सीजन है, न रेम्देसिवियेर इंजेक्शन हैं, हैं भी तो कालाबाजारी करने वालों के पास, जो दूसरे महायुद्ध के दिनों की तरह एक-एक इंजेक्शन 50-50 हजार रुपये तक में बेच रहे हैं। कोरोना टेस्ट तक नहीं हो रहे। हो भी रहे हैं, तो पांच दिन तक रिपोर्ट नहीं आ रही। निजी जांच कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं, जो जांचें हो रही हैं, वे सोलह आना भरोसे लायक नहीं हैं। अब हर रोज तीन लाख तक नए मरीज आ रहे हैं। ढाई-तीन हजार मौतें रोज हो रही हैं। आंकड़े घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। यहां तक आशंका व्यक्त की जा रही है कि अभी इसका चरम बाकी है। चारों तरफ अव्यवस्था का आलम है। लोग अस्पताल जाने से घबरा रहे हैं। ये कैसे समय में जी रहे हैं हम? जाहिर है, ऐसी स्थिति में सर्वोच्च अदालत मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती। यदि वह सरकार से आगे का रोडमैप मांग रही है, तो गलत नहीं कर रही। व्यवस्था को कसने के लिए अदालतों को न केवल कड़ाई करनी चाहिए, बल्कि कोरोना के खिलाफ युद्ध को वैचारिक रूप से भी बल देना चाहिए। अभी पूरा ध्यान जमीनी स्तर पर सुविधाओं को बहाल करने पर होना चाहिए। जितनी जल्दी हम सुविधाओं को बहाल करेंगे, उतना ही अच्छा होगा। यह वक्त भरोसे को कायम रखने का है और जब अदालतें दोटूक बात करती हैं, तब लोगों का मनोबल बढ़ता है।

ऑक्सीजन का अभाव न केवल दुखद, बल्कि पूरे देश के लिए एक अवसर भी है। यह सबक है कि हम अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को इस तरह दुरुस्त करने में लग जाएं कि फिर कभी ऐसी महामारी आए भी, तो हमें परेशान न करे। अकेले दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में अगर 24 घंटे में 25 मरीजों की मौत हुई है, तो देश के दूसरे अस्पतालों में क्या हो रहा होगा, इसका अंदाजा हम सहज ही लगा सकते हैं। यदि बहुत बीमार मरीजों की मौत हुई है, तो भी यह हमारे लिए बड़े दुख की बात है, लेकिन अगर ये मौतें ऑक्सीजन से जुड़ी किसी कमी के कारण हुई हैं, तो हमारी व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। निजी अस्पतालों को सुविधाओं और संसाधनों के लिए जाना जाता है, ऐसे ही अस्पतालों में गंगाराम अस्पताल भी शामिल है। ऐसे अस्पतालों से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे सार्वजनिक अस्पतालों के सामने एक आदर्श पेश करेंगे। सार्वजनिक अस्पतालों पर जो दबाव बना हुआ है, वह कोई नया नहीं है, लेकिन जब निजी अस्पताल भी हांफने लगे हैं, तब यह पूरे देश के लिए चिंता की बात है। विगत दशकों में जिस तरह से निजी अस्पतालों को फलने-फूलने दिया गया है और जिस तरह से निजी अस्पतालों का आकार-प्रकार व संख्या बढ़ी है, उसी हिसाब से उनसे उम्मीदें भी हैं।
दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से आपात स्थिति है, तो प्रधानमंत्री के साथ बैठक में भी इस पर तकरार आश्चर्य की बात नहीं है। नेताओं के बीच तकरार बढ़ना तय है, क्योंकि दोषारोपण की प्रवृत्ति पुरानी है, लेकिन अब जब नेताओं के बीच संघर्ष हो, तो आम लोगों को सचेत रहना चाहिए और याद रखना चाहिए कि जब जरूरत थी, तब राजनीतिक दल कैसा व्यवहार कर रहे थे? यह समय पार्टियों के झंडे लहराने का नहीं है, अब बात देश के झंडे पर आ गई है। भारत कोरोना ही नहीं, अभावों का भी एक बड़ा केंद्र नजर आ रहा है। अभी महीने भर पहले ही हम दवाओं और टीके का अंतरराष्ट्रीय वितरण कर वाहवाही बटोर रहे थे। अब समय आ गया है कि हम अपनी मांग पहले पूरी करें। दुनिया इस बात को समझती है कि भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है और यहां चिकित्सा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखना उतना आसान नहीं है। हमने देखा है, जब अमेरिका या यूरोपीय देशों में कोरोना की लहर चरम पर थी, तब वहां भी चिकित्सा सेवाओं का ऐसा ही हाल था। पर उन देशों ने युद्ध स्तर पर इंतजाम किए। एक दवा कम पड़ी थी, तो डोनाल्ड ट्रंप भारत पर लगभग भड़क उठे थे। आज ट्रंप की उस नाराजगी को समझा जा सकता है। सोचिए, राष्ट्रीय राजधानी जब ऑक्सीजन मांग रही है, तब देश के बाकी इलाकों में क्या स्थिति होगी? राज्य सरकारों को भी स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी भूमिका को अच्छे से समझने की जरूरत है। राज्यों में विशेष रूप से बुनियादी सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार से जरूरी संसाधन व धन मांगने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। कोरोना हमें रुला-रुलाकर जो सिखा रहा है, वह हमें भूलना नहीं चाहिए। विफलता को मानने और गलतियां सुधारने की योग्यता-क्षमता होनी चाहिए। ऐसे मुश्किल समय में किसे राजनीति सूझ रही है, जरूर दर्ज होना चाहिए। गंगाराम या नासिक के हादसे तो चंद उदाहरण हैं कि सरकारें संभाल नहीं पा रही हैं। यह लोगों के दुख-दर्द पर मरहम लगाने का वक्त है, जो सरकारें इस काम को अंजाम देंगी, देश उन्हें हमेशा याद रखेगा

डॉक्टर पुष्पराज गौतम प्राचार्य पीएन कॉलेज परसा